Friday, December 30, 2011

पैरोडी तो बहुत पढ़ लिए आपने मेरी, कुछ संजीदा बातें भी कह लूं आज ज़रा सा जायका बदलने को 

मेरे ज़ख्मों को, न छेड़ ऐ मेरे यार, कहीं फिर से यह हरे न हो जाएँ /
जिनको तू कहता है शरीफ. नकाब उन चेहरोंसे कहीं उतर न जाएँ /
एक मुद्दत से ग़म को छूपाये सीने में, दिल के टुकड़े को जोड़े हैं मैंने /
ऐसा न कर हरकत कोई , ऐसा न हो यह टुकड़े फिर से बिखर जाएँ /
जिनको बिठाया था इस दिल में, लगा नहीं सकते उनपे तोहमत /
हो जाएँ रुसवा वह , उससे बेहतर है "कुंदन" कि हम ही मर जाएँ /
मित्रों आये दिन बैंकों में डकैती की खबर तो आप पढ़ते ही होंगे / इसके अलावा बैंक कर्मियों की मिली भगत से धोखाधड़ी और ठगी के मामले भी सामने आते हैं/ रही सही कसार सरकार पूरी करती है, क़र्ज़ माफी का लाभ उन लोगों को देकर जो बैंक के लोन वापस करने का नाम ही नहीं लेते / और सरकार का यह कमीनापन जो को लाख करोड़ तक है सारी डकैती , ठगी और धोखाधड़ी के कान काटने में समर्थ है /तो इसी सन्दर्भ में आज की यह दूसरी प्रस्तुति है मेरी / पढ़िए और टिप्पणी कीजिये इस पर /

डकैती 

पढ़े लिखे बेरोजगार युवक ने बैंक पे धाबा बोल दिया 
हाथ कुछ तो लगा नहीं , मुफ्त में ही वह पकड़ा गया //
थाणे बाबुने कहा उससे , बड़ा बेवकूफ हे रे तू ऐ बेटा
काम ऐसा क्यों किया तूने, जो तुझे करना न आता //
लोन ले लेता तू किसी बैंकसे, कभी न वापस करनेको
बैंक वाले आते तेरे घर, तेरी ही खुशामद करने को //
उल्टी गंगा बहे देश में मेरे, चोरों को मिलती इज्ज़त
सच्चाई के राह जो पकडे, उसकी तो आती है शामत //
योजना ऐसी है सरकारी, क़र्ज़ माफ़ तेरा हो ही जाता
बिना डाले डकैती बैंक में, माल जेब में आ ही जाता //
फिर से लोन लो ऐ मालिक, बैंक वाले आ कर कहते
हार तुझे वह पहनाते, तेरे चरणों को रे सब धोते //

भारत निर्माण का यह एक और नमूना है, देखिये किस तरह देश बर्बाद हो रहा है नेताओं के हाथों
यह पोस्ट विशेष रूपसे मेरी बहन उषा और नैनी के लिए है / दादा का एक और रंग देखो आज / भक्ति का रंग जिसमें केवल समर्पण और विश्वास का भाव होता है 

दौड़ते आये चक्र लिए तुम , गज ने पुकारा जब तुमको 
आये नहीं पर कभी "चक्रधर" मैंने पुकारा जब तुमको ---------
हूँ मैं अभागा या हूँ कर्महीन, दर्शन जो तुम देते नहीं 
आस की डोरी फिर भी न टूटी , चाहे तुम हो सुनते नहीं
मन की साध तो होगी पूरी, इतना भरोसा है मुझको ,--------------
मन में कोई खेद नहीं प्रभु , चाहे वर तुम दो न दो
ह्रदय में तुम तो बसे हुए हो, चाहे नैन के आगे न हो
अन्तकाल मैं आना गिरधर, इतना कहना है मुझको, ------------
भक्ति का रंग लिए हुए आज का दूसरा पोस्ट /

धन की चाहत है किसको - और कोई मन खोजता है 
मुझको क्या करना इनका - जब तू मेरे मन में बसता है ---
अन्तर्यामी तू कहलाता - मन की बातें तू जानता है 
खोलके होंठ मैं क्यों कहूं - तू घट घट में रमता है
चाहे मैं याचक न बनूँ पर - तू तो एक ही दाता है ,---------
सारे जगत का नाथ है तू - जग से मैं तो नहीं परे
हाथ हो तेरा जब सर पे - किससे यह मन क्यों डरे
भाग्य की फ़िक्र मैं क्यों करूँ, तू जब भाग्य विधाता है ------------
जो भी बदा हैं तूने प्रभु, कोई कहाँ छीन सकता है
यही सोच कर मन मेरा , बस तेरा नाम ही जपता है
मिल जाये तेरी कृपा जिसे, चाहत क्या कर सकता है --------------
Aaj ka post kuchh hat kar hai, group ke hit men jis par sabhee ka dhyaan chahoonga

हर इंसान में एक बड़ी कमजोरी रहती है कि वह अपनी बात , अपने काम को ही सही साबित करने की कोशिश में इतना अधिक व्यस्त रहता है कि वह किसी और बात पर ध्यान देने के लिए फुर्सत ही नहीं पता / और वह इस तरह बहुत ऐसे मौके खो देता है जो उसके ज्ञान, समझ और व्यक्तित्व के विकास में काम आ सकते थे / इस कमजोरी की मात्र किसी में १ % हो सकती है तो किसी में १०% और किसी में ९०% / जिस दिन किसीको यह बात समझ में आ जाती है उस दिन उसके जीवन में एक नया मोड़ आता है / इसी पर एक लघु कथा सुनिए /
एक कार्यालय में किसीने एक पत्र का प्रारूप भेजा कार्यालय प्रमुख के पास / प्रमुख ने उसमें कुछ शब्दों के फेर बदल कर उसे वापस भेज दिया सम्बद्ध कार्मिक के पास टंकण के लिए / कार्मिक को बड़ा बुरा लगा , और उसने बडबडाना शुरू किया प्रमुख की नासमझी पर / किसीने जा कर कान भर दिए कार्यालय प्रमुख के / कुछ देर बाद चपरासी ने आ कर उस कार्मिक से कहा आपको साहब बुला रहे हैं , साथ में वह पत्र भी लेते जाइए /साहब ने पूछा सुना है आप पत्र के प्रारूप में मैंने जो संशोधन किये उसे ले कर असंतुष्ट हैं/ बेचारा कोई जवाब दे नहीं पाया /साहबने कहा अच्छा ज़रा गिनके बताइए पूरे पत्र में कुल कितने शब्द हैं / इसने कहा जी २८८ / साहब ने पूछा फिर से, मैंने कितने शब्द बदले हैं वह भी गिन कर बताइए ? / इसने कहा जी ३६ / साहब ने कहा तो सोचिये मैंने पत्र का आठवां हिस्सा अर्थात १२.५% शब्द ही बदले हैं, जिन्हें मैंने ठीक नहीं समझा / परन्तु मैंने ८७.५% उन शब्दों को स्वीकार भी किया जो आपने लिखे और जो मुझे अच्छे लगे / मैं अगर ८७.५% आपकी बातों को पसंद कर सकता हूँ तो क्या आप का ह्रदय इतना उदार नहीं है कि आप मेरे १२.५% प्रतिशत बात को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करें ?कहना अनावश्यक है कि दोनों के मन में कोई खटास नहीं रही इस वार्तालाप के बाद /
निष्कर्ष यह है कि हम अगर इस तरह के विचार को अपने मन में स्थान दें तो क्या मित्रों से टकराव नहीं टाल सकते, अपने संपर्क को बेहतर नहीं बना सकते ?
भजन लिखा नहीं जाता, अपने आप कागज़ पर लिख लेता है लिखनेवाला जब "वह" उससे लिखवाना चाहे. / मेरी बहन उषा के अनुरोध पर आज मातारानी का यह भजन प्रस्तुत किया जा रहा है आप सभी के लिए / आशा है आप इसे पसंद करेंगे और इस पर अपनी टिप्पणी दे कर मुझे अनुग्रहित करने की कृपा करेंगे 

सारे दुखों का अंत हो जाए , लहरें खुशी की मन को भिगोये 
अनहोनी यह करके दिखाए कौन--- बोलो बोलो कौन 
वह माता रानी है-- मेरी माता रानी है -- जय माता दी -----------
सुख है चंचल हिरनी सरीखा, उसके पीछे भागे जो
पग में छाले पड़ जाते और मन का चैन गंवाए वह
पथ की सब बाधा हट जाए , ह्रदय कमल भी खिल खिल जाए
अनहोनी यह करके दिखाए कौन--- बोलो बोलो कौन
वह माता रानी है-- मेरी माता रानी है -- जय माता दी -----------
जिसने माता को है पहचाना, सारे जग को उसने जाना
धुप-छाँव और सुख-दुःख का, फर्क कोई न उसने माना
माता चरण में सर जो झुकाए, संकट आये तो टल जाए
अनहोनी यह करके दिखाए कौन--- बोलो बोलो कौन
वह माता रानी है-- मेरी माता रानी है -- जय माता दी -----------

एक लेखक के रूप में लिखते हुए मैंने हमेशा इस बात को महसूस किया है कि भजन लिखने में जो शांति मिलती है मन को वह कुछ और लिखने में कभी नहीं मिलती / तो मित्रों आप सभी के लिए एक भजन प्रस्तुत है / अगर आप को पसंद आया तो मैं अपने आपको धन्य मानूंगा

भोले बाबा जपता रहूँ मैं नाम तेरा निश- दिन
मनमंदिर में शिव विराजें हर पल और हर छीन --------
तपती रेट है जीवन का पथ
जग झूठा है तू ही एक सच
तडपूं ऐसे तेरे दरश को, जैसे जल बिन मीन , मन मंदिर ------
मोह माया में मन नहीं रमता
तेरी खोज में मन है भटकता
कब लेगा तू अपनी शरणमें, जाए दिन गिन गिन, मन मंदिर ----
पुन्य कोई मैंने नहीं कमाया ,
बस तेरा ही गीत मैं गाया
नाम तो आशुतोष है तेरा, तोष होगा किस दिन, मन मंदिर में ---