Saturday, June 9, 2012

मित्रों, सच कहूं तो आज मैं बहुत दुखी हूँ / मेरी ग़लती की सज़ा कोई और भोग रहा है / दोपहर से देख रहा हूँ हर कोई लाल पीला हो रहा है , मोंटेक सिंह पर क्यों कि उसने शौचालय पर ३५ लाख खर्च करवा दिए/ क़सम से, कसूर उसका नहीं , सारा क़सूर तो मेरा है / कुछ दिन पहले उसने मुझे फ़ोन पर कहा अरे भाई क्या सिर्फ अपने मामा पर ही पैरोडी लिखते रहोगे? हम भी सरदार हैं ,नीली पगड़ी भी बांधते हैं और कमीनेपन और स्वार्थी चाल में तुम्हारे मामा से कोई कम नहीं हैं / ठीक है, हम भी कुछ ऐसा करते हैं कि तुम मजबूर हो जाओगे हम पर पैरोडी लिखने को / तो बताइए कसूर मेरा है या उसका / मैंने अगर पहले से उस पर पैरोडी लिख दी होती तो शायद ३५ लाख बर्बाद होने से बच जाते / वैसे जब इनके खाने पीने का बोझ हम पर है तो इनके शौच की सुविधा का जिम्मा भी तो हम ही लेंगे न ? खैर मज़ा लें..

मूल गीत - फिल्म तीसरी क़सम

दुनिया बनानेवाले , क्या तेरे मन में समाई
काहेको मोंटेक बनाई , तूने काहे को मोंटेक बनाई ----
काहे बनाये तूने योजना आयोग
वहां बिठाए कैसे कैसे यह दानव
कोई न योजना कैसा यह आयोग
सभीने लगाया मेरे देशको देखो रोग
रोग लगा दी पर- कभी न दी है दवाई , काहे को मोंटेक--
खाने को ३२ और शौच के ३५ लाख
हम तो हुए ख़ाक, बन गयी इनकी साख
बन्दर के हाथों में उस्तरा थमाया
गर्दन कटे न कहीं भय है समाया
भयभीत जनता जहाँ कैसे होगी भलाई , काहे को मोंटेक--
एक है मोंटेक यहाँ - एक मनमोहन
मन से नहीं नाता, इनको लुभाए धन
क्रिया करम किया दोनों ने देश का
अफ़साना क्या सुनाएँ हम इनके ऐश का
भोंपू इमानदारी की इन अय्याशों ने बजाईए, काहे को मोंटेक---

नोट - अगर आप को यह पसंद आया तो दूसरा भी डालता हूँ कुछ हे देर में
दूसरी पेरोडी मोंटेक पर , मन है नहीं पर टिका हुआ है यह / मूल गीत है फिल्म अनमोल घड़ी का - क्या मिल गया भगवान्

क्या मिल गया भगवान् तुम्हे 'मोंटेक' बना के 
शीशम की यह लकड़ी पे तुम्हे दीमक लगा के ,---
हम सोच रहे थे कभी खुशहाल हम होंगे 
आजादी जो आयेगी तो हंस हंस के जीयेंगे
क्या क्या थी खबर तुम को न आयेगी दया भी
गद्दी दिया तुमने गधों को , देश डूबा के
शीशम की यह लकड़ी पे तुम्हे दीमक लगा के ,---
मोंटेक ही दुश्मन नहीं दुश्मन है मामा भी
जो सच के साथ हैं उन्हें न चैन कहीं भी
यह कैसी है सरकार तुम्हे देश में बोलो
कीचड लगाए माथे पे जो चन्दन कह के
शीशम की यह लकड़ी पे तुम्हे दीमक लगा के ,---
३२ का खर्चा जो करे कहलाये वह अमीर
टायलेट है लाखों की लेकिन कैसे यह फ़कीर
जो छीन के रोटी हमारी खाते ही रहते
टायलेट का खर्चा रहेगा वसूल वह करके
शीशम की यह लकड़ी पे तुम्हे दीमक लगा के ,---
तो भाइयों चलो एक और पैरोडी हो जाए / मन्नू मामा भी खुश उसका कोई जोडीदार मिल गया कहके / मूल गीत है शोले का - यह दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे 

यह शैतानी हम नहीं छोड़ेंगे 
सारा खून जनता का पी के ही छोड़ेंगे ----
तेरा मुंह - मेरा मुंह, तेरा पेट - मेरा पेट 
ऐसा है रिश्ता
लोग रोते हैं सारे , माल सब महंगा
अपनको तो सस्ता
डटके हम खायेंगे - शान से टायलेट जायेंगे
अपना यह रास्ता , यह शैतानी--------------
लोगों को आते हैं दो नज़र हम मगर
देखो दो नहीं
नीली पगड़ी बांधे हैं, कामिक्स* के हम पंडित है
हम सा कोई नहीं
३२ के लोग खाते हैं- ३५ के हम जाते हैं
ख़ास फर्क कोई नहीं , यह शैतानी-----------
अपनी तो चांदी है , जनता अपनी बांदी है
मुंह न खोलेगी
ऐसा ही चलता रहे, मलाई खाते रहें
मस्त यह ज़िन्दगी
पूण्य क्या - पाप क्या, माँ क्या- बाप क्या
मेडम की बंदगी , यह शैतानी --

* कामिक्स - कल हमारे छोटे भाई अरबिंद पाण्डेय जे एने एक बढ़िया बात कही- की मामा और मोंटी इकानोमिक्स नहीं हारर कामिक्स के पंडित है / वह बात बड़ी पसंद आयी मुझे इसलिए इस शब्द का प्रयोग किया..
अब तो भैया, पैरोडी के अलावा और कुछ लिखने का मन ही नहीं होता है / एक तो मन तोडा सा हल्का हो जाता है और ४ लोगों को खुशी मिलती है, ज्यादा न सही / इसी बहाने थोडा सा पुण्य कमा लेते हैं/ तो आज का मूल गीत है फिल्म "उड़न खटोला" से "मोहब्बत की राहों में चलना संभल के " देश की हालत पर है यह व्यंग

सच्चाई की राहों में चलना संभल के 
यहाँ जो भी आया, बना वह तो जेल के ,----
न पायी किसीने न्याय की मंजिल 
जाने टूटी कितनी जोड़ी चप्पल के ,------
हमें देती दावत मक्कारों की दुनिया
हंसी वह उडाये मेरे इन उसूल के ,-----
तोड़ दे न तुझको तेरी यह सरकार
पुलिस साथ उसके रहना संभल के -----
सारे कसाई आज राजा बने हैं
जेबें भरें अपनी शरीफों को छल के ,----
जो है चोर पाजी, बना है ईमानदार
धरम खो गयी है, लंगडी चाल चल के ,-----
दिन यह फिरेंगे एकदिन होंगी बहारें
बंधाती है हिम्मत, इशारे यह दिल के ,---
बहरे बने हो क्या हे भगवन बताओ
करो कारनामा अब तो तुम ही कमाल के ------
यह तो पक्की बात है कि आप सभी ने फिल्म गाइड का गीत "गाता रहे मेरा दिल" सुना ही होगा / अब उस गीत को अपना मन्नू मामा कैसे गाता है सुन लीजिये 

गाता रहे मेरा दिल - मैं अपराधी मैं हूँ वकील हाय
जब तक मैडम हैं हाकिम, अपना धड़केगा ही दिल , गाता रहे ---
ओह मेरे मोंटी यार , पैखाना साफ़ ही रखना
लोगों का सोचे क्यों, उनको तो भूखों मरना
ओछापन हमें सीखला देगा ग़लत काम सब करना
जब तक मैडम हैं हाकिम, अपना धड़केगा ही दिल , गाता रहे ---
काहे की अब चिंता , मिडिया जो साथ रही है
टुकड़े खा कर देखो , नग़में सुना रही है
६० बरस से यही तो सिस्टम काम आ रही है
जब तक मैडम हैं हाकिम, अपना धड़केगा ही दिल , गाता रहे ---
जानती है सब पब्लिक, किसी फिल्म का है गाना
जान अगर यह जाती, बिस्तर गोल हो अपना
जो न पूरे करने हो, दिखलायें इनको सपना
जब तक मैडम हैं हाकिम, अपना धड़केगा ही दिल , गाता रहे ---
अनगिनत है जनता, गिनती अपनी उंगली पर
दिए जाते हैं फिर भी हम चक्कर पे चक्कर
ऐसे नीच हैं हम जो न ले कोई भी हमसे टक्कर
जब तक मैडम हैं हाकिम, अपना धड़केगा ही दिल , गाता रहे ---
यह उस कुँवारे पर है , जो शायद आजीवन कुंवर रहने के लिए ही पैदा हुआ है / पढ़िए और रविवार का आनंद लीजिये 

कुँवारा हूँ--- कुंवारा हूँ
सब लानत भेजे, पर
कहता सबका दुलारा हूँ........
राज-पाट नहीं, कोई धाक नहीं
मुझको युवराज यह कहते हैं
सारे देश में खिल्ली उड़े
तारीफें चमचे करते हैं
शोले कहते पर हल्का सा
नहीं शरारा हूँ...............
रोटी दलितों का छीनता हूँ
उनके घर पर मैं सोता हूँ
करता हूँ दिखावा, कभी कभी
मैं उनके नाम पे रोता हूँ
जनता - नहीं देती वोट
ऐसा तकदीर का मारा हूँ........

अपनी टिप्पणी

जो पाप किये तेरे पूर्वज
तू फल उसीका भोगता है
जो पेड़ बबूल का बोता है
कभी आम कहाँ वह खाता है
करले प्रायश्चित रे मूरख
कहता मैं दोबारा हूँ.....
मांगने आयी थी आग, बन बैठी मालकिन, यह तो आपने सुना ही होगा. यह पैरोडी उसी पर है

घर आयी मेरे परदेसन 
क्या पता निकलेगी वह डायन-----
जादू ऐसा किया उसने
सारे शेर बने मेमने
सब को ओढाने लगी वह कफ़न,
क्या पता निकलेगी वह डायन-----
लोग भी कैसे अहमक है
अंगारा पल्लू में रखते है
उसपे लुटाते देश का धन
क्या पता निकलेगी वह डायन ---
जाने मर्ज़ है क्या उसको
बार बार जाए विदेश को
जाने मरेगी कब पापन
क्या पता निकलेगी वह डायन------
हद तो हो गयी अब यारों
बन बैठे है "चुड़ैल" - "पारो"
सहता कैसे तुम्हारा मन
क्या पता निकलेगे वह डायन------